कैसे बतायें की क्या गुज़री है
हर एक आह पे जो जान निकली है ।
हुस्न वाले तुझे क्या ख़बर
तेरी हर बात पे जो रात निकली है।
अब तुमसे क्या छिपाना जानेजाना
जो जान कर भी अनजान निकली है।
एक नज़र इधर भी देख लेते
जो हर बाज़ार में बदनाम निकली है।
काँच अपना दर्द क्या बताये
जो हर प्याले में जाम निकली है।
अब हम जायें तो किधर जायें
जो हर राह तेरे द्वार को निकली है।
Wednesday, June 3, 2009
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तेरी हर नज़्म पर ऐ आशिक
ReplyDeleteइस कद्रदान की जुबां से वाह निकली है
maan gaye janaab ... waah waah